अपने भी ख्वाब देखें बिखर तो नहीं गये
जीते जी हम भी जिस्म में मर तो नहीं गये .........
हासिल तो हो गयी हैं हमें भी बुलन्दियाँ
नज़रों से अपनी हम भी उतर तो नहीं गये ..........
कोई हमें भुला के भी जीता है जिन्दगी
हम भी किसी की याद में मर तो नहीं गये ........
अफसोश क्या सरों से जो दस्तारें गिर गयीं
ये लोग इस पे खुश हैं की सर तो नहीं गये ........
क्यूँ इन दिनों नहीं है जमाने से कुछ गिला
औरों के साथ हम भी सुधर तो नहीं गये .......
तामीर कर दिखायेंगे फिर ताज हम नया
गो हाँथ काट गये हैं हुनर तो नहीं गया .......
तहजीब उस जहान की आने लगी इधर
आदाब इस जहाँ के उधर तो नहीं गये .......
छप्पर तो अपने जाने ही वाले थे अब के भी
आँधी में अब के बुढे शजर तो नहीं गये .....
hiiiii frnd h r u
ReplyDeleteiam fine u
ReplyDelete