Sunday, October 31, 2010

भोर-रूपा साँझ-सोना रात-मधुवंती हुई

हो गया है प्राण-कोकिल
देह-वासंती हुई।
द्वार पर मंगल कलश है
आँगना-रांगोलिका
हाथ-मेंहदी
पाँव-जावक
रत प्रतीक्षा गोपिका
हंस-पाती बाँचती-सी
पुलक-दमयंती हुई।
यों हवा छूकर चली
संकेत में कुछ कह गई
फूटकर रस निर्झरी-सी
छल-छलाकर बह गई
कान में फिर सप्तस्वर
बजने लगे,
घुलने लगे
आवरण सारे सहज
हटने लगे
खुलने लगे
पर न फूटा मौन
ऐसी बात लजवंती हुई
और,
तुम आए
मलय की
शांत शीतल गंध से
प्राण में गहरे उतरते
राग रंजित छंद से
लय-विलय
होते गए हम
द्वैत से अद्वैत में
स्वर्ग अपने रच लिए थे
पत्थरों में
रेत में
भोर-रूपा
साँझ-सोना
रात-मधुवंती हुई।


आजा भई जम्हूरे - तमाशा दिखायेंगे तो कुछ मिल सकता है

आजा भई जम्हूरे
तमाशा दिखायेंगे तो कुछ मिल सकता है
गुजारा कुछ दिन और चल सकता है
अच्छा जो पूछेगा बतलायेगा
हाँ उस्ताद
बता- अफगानिस्तान में जब दो पठानों को जब दो बम मिले तो उन्होंने क्या किया?
उस्ताद बताता हूँ
पहला बोला कि चलो इसको पुलिस थाने में दे आते हैं
फिर-
दूसरा बोला- रास्ते में बम फूट गया,तब क्या होगा
झूट बोल देंगे कि एक ही मिला था- पहला बोला
जम्हूरे ,अब जो मैं पूछूँगा, बतलायेगा
हाँ उस्ताद
बता ब्लॉग जगत में किसको किसके दो बम मिले?
नहीं बतलाऊंगा
अच्छा चल ये बता उनमे से एक बम का हुआ क्या?
उस्ताद उनमे से एक ब्लॉगर बोला
बम को ब्लोग्गेर्स के थाने ले जायेंगे
बाकी ब्लोगर्स बोले अब तो हम भी जायेंगे
फिर दुसरे का क्या हुआ
दूसरा बम गायब हो गया
डर ये है कि दूसरा कहीं थाने ले जाते हुए फट न जाए
चल अपन को क्या मतलब,जम्हूरे
चल साब लोगो,और मेम साब को सलाम ठोक
सर में भी दर्द हो गया है
जा सामने वाले साहब से एक nise(nice) की गोली ले आ
अच्छा तो मेहरबानो,कद्रदानों
जम्हूरा बड़ी उम्मीद से आपके पास आ रहा है
मन (बम भर के नहीं) भर के दीजिए
प्रभु आपका भला करेगा
और वैसे भी
जो दे उसका भला, जो न दे उसका तो है ही भला

यह डाटाबेस कल २२अप्रैल को रात ११.३५ बजे ब्लोगवाणी से उठाया गया है .

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read/liked/disliked/comments
उपर्युक्त डाटा यह बताने के लिए काफी है कि ब्लॉग जगत में हो क्या रहा है और क्या लोग पसंद करते हैं .
यह डाटाबेस कल २२अप्रैल को रात ११.३५ बजे ब्लोगवाणी से उठाया गया है .
अवधिया जी ने भी आज सुबह का डाटा लिया है ,जो उन्होंने आज पोस्ट किया है .उस पर भी जाकर देंखें और यह निर्णय ले कि आखिर हमें चाहिए क्या ?
आप सबकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा

होनहार विद्वान के, होत चीकने गाल

होनहार विद्वान के, होत चीकने गाल

जब छोटे बच्चे थे ,तो इस मुहावरे को यह ही मानते थे .
प्रभु का दिया हुआ गोरा रंग था गालों का रंग भी सुर्ख लाल था.
माँ हमारे रंग रूप पर इठलाती थी.
जब भी आईने में चेहरा देखते,लाल-लाल गालों को देख कर बाल मन के अंदर यह बात भर गयी थी कि कुछ हो ना हो विद्वान तो हम होंगे ही.
थोडा और बड़े हुए ,तो तह बात मन में और पैठ कर गयी.फिर क्या था, एक दिन
पिताजी के पास जा पहुंचे .
पिताजी बोले आ मेरे राजा बेटे ,बोल क्या बात कहनी है.
पिताजी,एक कविता बनायी है ,उसे किसी बाल पत्रिका में छपवा दीजिए ना.
हाँ हाँ ,क्यों नहीं ,मेरे राजा बेटे ने कविता बनायी और वो छपे ना.कल अवस्थीजी के पास चले जाना,मैं उन्हें फोन कर दूँगा.गनीमत यह थी कि कौन सी कविता हमने बनायी है ,उन्होंने दिखाने को नहीं कहा.रात भर सपनों में अपने आप को बड़ा कवि बना हुआ देखते रहे.खैर सुबह हुई,तैयार होकर वो कागज लिया, जिस पर कविता लिखी हुई थी ,और अवस्थीजी के पास पहुँच गए.
आओ बेटे आओ,दो, क्या लिखा हुआ है .तुम्हारे पिताजी का फोन आया था कि बड़ा होनहार लड़का है,उसकी रचना छाप कर उसे उत्साहित करना,ना जाने कल को येक्या बन जाए,और नाम कमाए.हमने वो कागज उनको पकड़ा दिया.वो बड़े परेशान,कहने लगे" बेटे इसमें तो दो लाइन ही लिखी हैं और वो ये हैं-
मछली जल कि रानी है,इसका जीवन पानी है.
ये तो बेटे बच्चों कि पत्रिकाओं में छपती रहती है.
तो क्या हुआ?मेरे नाम से छाप दो और हमने रोना शुरू कर दिया .
अच्छा चुप हो जाओ,मैं आकेप पिताजी से बात कर लूँगा.
रोते रोते घर पहुंचे,देखा पिताजी घर पे ही थे.
दिखा बेटे क्या लिखा है ,जैसे ही दिखाया,पिताजी ने दो चांटे मर हमारे चीकने गाल लाल कर दिए .हमें पक्का हो गया कि ये मुहावरे कहने भर के लिए ही होते हैं.
समय बीता,बड़े हुए,लेकिन कविता कहानी लिखने का शौक बना रहा.मित्रों को सुनाता ,तो दोस्ती तोड़ने का रोब देते ,पत्नी तो खैर किसी कीमत पर सुनने को तैयार नहीं .
खैर हरेक का समय आता है,एक दिन ब्लोग्स पर निगाह पड़ी,जब से कोई परेशानी नहीं ,
जो मन आता है उल्टा हो या सीधा ,मतलब का हो या बेमतलब,ब्लॉग में लिखदेता हूँ .सब ठीकठाक चल रहा है.और वैसे भी .........
जो पढ़े उसका भला ,जो ना पढ़े उसका तो है ही भला

कुत्तों ने "शोले" देखी. पर क्या देखी !!!

तकरीबन 35 साल पहले फिल्म “शोले" ने जो तहलका मचाया था उसकी तपिश, उसका सरूर अभी तक लोग भुले नहीं हैं। इंसान तो इंसान जानवरों पर भी उसका जादू सर चढ कर बोला था।
कलकत्ता के सामने हुगली नदी के पार “बांधाघाट” का इलाका। उस कस्बाई इलाके के एक साधारण से सिनेमाघर “अशोक” में कई दिनों से शोले बदस्तूर चल रही थी। सिनेमाघर बहुत साधारण सा था। सड़क के किनारे बने उस हाल की एक छोटी सी लाबी थी। उसी में टिकट घर, उसी में प्रतिक्षालय, उसी में उपर जाने की सीढियां। वहीं अंदर जाने के लिये दो दरवाजे थे। जिसमें एक हाल के अंदर की पिछली कतारों के लिये था तथा दूसरा पर्दे के स्टेज के पास ले जाता था। उन पर मोटे काले रंग के पर्दे टंगे रहते थे। गर्मी से बचने के लिये अंदर सिर्फ पंखों का ही सहारा था। शाम को अंधेरा घिरने पर हाल के दरवाजे खुले छोड़ दिये जाते थे जिससे दिन भर बंद हाल में शाम को बाहर की ठंड़ी हवा से कुछ राहत मिल सके।

दोपहर में गर्मी से बचने के लिये दो-चार “रोड़ेशियन" कुत्ते लाबी में आ कर सीढियों के निचे दुबके रहते थे। लोगों के आने-जाने से, शाम को दरवाजे खुले होने से वे भी गानों इत्यादि को सुनने के आदी हो गये थे। पर दैवयोग से उन्होंने अपने से सम्बंधित संवाद नहीं सुना था।

उस इलाके में कोई भी फिल्म एक दो हफ्ते से ज्यादा नहीं चलती थी क्योंकि अधिकांश लोग शहर जा सुविधायुक्त हाल की ठंड़क में फिल्म का मजा लेते थे। पर जब महीने भर यहां से शोले नहीं उतरी तो हमारे इन “रोड़ेशियन” को भी आश्चर्य हुआ क्योंकि वे भी कुछ दिनों बाद नये पोस्टर देखने के आदी हो गये थे। फिर दूसरी बात यह कि उन्हें अंदर से आती फिल्म की आवाजों को कई लोगों को दोहराते सुना तो उन्होंने भी एक एतिहासिक फैसला लिया कि हम भी अंदर जा यह फिल्म देखेंगे कि इसमें ऐसा क्या है जो लोग इसे बार-बार देख रहे हैं। पर अंदर जाना और उतनी देर छिप कर बैठे रहना बहुत मुश्किल काम था। किसी ने देख लिया तो लाबी की दोपहर की नींद से भी हाथ धोना पड़ सकता था। सो यह फैसला किया गया कि सब जने नहीं जायेंगें एक जना टुकड़े-टुकड़े मे पिक्चर देखेगा और रात को सब को उसके बारे में बताएगा।

तो एक दिन हमारा शेरदिल कालू रात के शो में छिपता-छिपाता अंदर चला ही गया। पर आधे घंटे के बाद ही बाहर आ खड़ा हुआ। सबने आश्चर्य से पूछा कि क्या हो गया? उसने कहा कि बस मार खाने से बच कर आ रहा हूं। सब फिर बोले अरे हुआ क्या था बताओ तो सही। तब कालू ने जवाब दिया कि मैं अंदर मुंह उठाए देख रहा था, तभी वहां एक गंदा सा आदमी आया, उसके हाथ में लंबा मोटा सा कुछ हंटर जैसा कुछ था। उसके सामने खंबे से एक आदमी बंधा हुआ था। वहीं एक सुंदर सी लड़की भी खडी थी। गंदे से आदमी ने उस लड़की से कहा, छमिया नाच के दिखा। तो खंबे से बंधा हट्टा-कट्टा आदमी बोला, नहीं बासंती, इस कुत्ते के सामने मत नाचना। अब बोलो अंदर हाल में इतने लोग नाच देखने को इकट्ठे हुए थे। उधर वह गंदा सा आदमी और बहुत से लोग बंदुके लिये खड़े थे अब मेरे कारण नाच नहीं हो पाता तो सबने मिल कर मुझे मारना ही था सो मैं भाग आया।

सब चुप हो गये समय की नजाकत को देख। पर वह जादू ही क्या जो सर पर ना चढ जाए। कुछ दिनों बाद फिर एक श्वान पुत्र के खून ने जोश मारा। उसने एलान किया कि जो भी हो वह आज रात फिल्म देख कर ही रहेगा। रात का शो शुरु होने के कुछ देर बाद वह अगले दरवाजे से अंदर दाखिल हो गया। पर दस मिनट बाद ही ड़र से कांपता हुआ अपनी पूंछ को पिछले पैरों में दबाये बाहर निकला और भागता ही चला गया। उसके साथी हैरान-परेशान उसके पीछे-पीछे भागे और एक सुनसान गली में उसे जा घेरा। वह अभी भी ड़र से कांप रहा था। सबने उससे कारण पूछा पर उसके मुंह से बोल ही नहीं फूट रहे थे। कुछ देर बाद उसने कहना शुरू किया कि मैं छिप कर ही अंदर गया था पर पता नहीं कैसे उस हट्टे-कट्टे आदमी ने मुझे देख लिया और मेरी तरफ ऊंगली उठा कर बोला, कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा। वह शायद समझा होगा कि मैं ही हूं जिसके कारण पिछली बार नाच ना हो पा रहा था सो इस बार तो वह मुझे मार देने पर ही उतारू हो गया था। वह तो मुझे मार ही देता यदि मैं भाग ना आया होता।