हो गया है प्राण-कोकिल
देह-वासंती हुई।
द्वार पर मंगल कलश है
आँगना-रांगोलिका
हाथ-मेंहदी
पाँव-जावक
रत प्रतीक्षा गोपिका
हंस-पाती बाँचती-सी
पुलक-दमयंती हुई।
यों हवा छूकर चली
संकेत में कुछ कह गई
फूटकर रस निर्झरी-सी
छल-छलाकर बह गई
कान में फिर सप्तस्वर
बजने लगे,
घुलने लगे
आवरण सारे सहज
हटने लगे
खुलने लगे
पर न फूटा मौन
ऐसी बात लजवंती हुई
और,
तुम आए
मलय की
शांत शीतल गंध से
प्राण में गहरे उतरते
राग रंजित छंद से
लय-विलय
होते गए हम
द्वैत से अद्वैत में
स्वर्ग अपने रच लिए थे
पत्थरों में
रेत में
भोर-रूपा
साँझ-सोना
रात-मधुवंती हुई।
बहुत सुन्दर रचना|
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखते है आप, मेरी शुभकामनाये.......मुझे भी कविताये लिखने का शोंक है, मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है..http://sparkindians.blogspot.com/
ReplyDeleteउत्तम रचना के साथ कृष्ण सिंह जी का चि_ा जगत में स्वागत है।
ReplyDeletegood one
ReplyDeleteइस सुंदर से नए ब्लॉग के साथ हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
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