Sunday, October 31, 2010

होनहार विद्वान के, होत चीकने गाल

होनहार विद्वान के, होत चीकने गाल

जब छोटे बच्चे थे ,तो इस मुहावरे को यह ही मानते थे .
प्रभु का दिया हुआ गोरा रंग था गालों का रंग भी सुर्ख लाल था.
माँ हमारे रंग रूप पर इठलाती थी.
जब भी आईने में चेहरा देखते,लाल-लाल गालों को देख कर बाल मन के अंदर यह बात भर गयी थी कि कुछ हो ना हो विद्वान तो हम होंगे ही.
थोडा और बड़े हुए ,तो तह बात मन में और पैठ कर गयी.फिर क्या था, एक दिन
पिताजी के पास जा पहुंचे .
पिताजी बोले आ मेरे राजा बेटे ,बोल क्या बात कहनी है.
पिताजी,एक कविता बनायी है ,उसे किसी बाल पत्रिका में छपवा दीजिए ना.
हाँ हाँ ,क्यों नहीं ,मेरे राजा बेटे ने कविता बनायी और वो छपे ना.कल अवस्थीजी के पास चले जाना,मैं उन्हें फोन कर दूँगा.गनीमत यह थी कि कौन सी कविता हमने बनायी है ,उन्होंने दिखाने को नहीं कहा.रात भर सपनों में अपने आप को बड़ा कवि बना हुआ देखते रहे.खैर सुबह हुई,तैयार होकर वो कागज लिया, जिस पर कविता लिखी हुई थी ,और अवस्थीजी के पास पहुँच गए.
आओ बेटे आओ,दो, क्या लिखा हुआ है .तुम्हारे पिताजी का फोन आया था कि बड़ा होनहार लड़का है,उसकी रचना छाप कर उसे उत्साहित करना,ना जाने कल को येक्या बन जाए,और नाम कमाए.हमने वो कागज उनको पकड़ा दिया.वो बड़े परेशान,कहने लगे" बेटे इसमें तो दो लाइन ही लिखी हैं और वो ये हैं-
मछली जल कि रानी है,इसका जीवन पानी है.
ये तो बेटे बच्चों कि पत्रिकाओं में छपती रहती है.
तो क्या हुआ?मेरे नाम से छाप दो और हमने रोना शुरू कर दिया .
अच्छा चुप हो जाओ,मैं आकेप पिताजी से बात कर लूँगा.
रोते रोते घर पहुंचे,देखा पिताजी घर पे ही थे.
दिखा बेटे क्या लिखा है ,जैसे ही दिखाया,पिताजी ने दो चांटे मर हमारे चीकने गाल लाल कर दिए .हमें पक्का हो गया कि ये मुहावरे कहने भर के लिए ही होते हैं.
समय बीता,बड़े हुए,लेकिन कविता कहानी लिखने का शौक बना रहा.मित्रों को सुनाता ,तो दोस्ती तोड़ने का रोब देते ,पत्नी तो खैर किसी कीमत पर सुनने को तैयार नहीं .
खैर हरेक का समय आता है,एक दिन ब्लोग्स पर निगाह पड़ी,जब से कोई परेशानी नहीं ,
जो मन आता है उल्टा हो या सीधा ,मतलब का हो या बेमतलब,ब्लॉग में लिखदेता हूँ .सब ठीकठाक चल रहा है.और वैसे भी .........
जो पढ़े उसका भला ,जो ना पढ़े उसका तो है ही भला

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